सूर्यकांत धस्माना ने सतपाल महाराज के शंख वाले बयान पर साधा निशाना, बोले- ‘मूर्खता की पराकाष्ठा’

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अमीषा भट्ट

*सतपाल महाराज का शंख वाला बयान मूर्खता की पराकाष्ठा – धस्माना*
*शंख कोई हड्डी नहीं, घोंघे का बाहरी खोल है, मंत्री जी को विज्ञान और सनातन दोनों का ज्ञान नहीं*

*देहरादून: 28 सितम्बर 2026*

श्री बद्रीनाथ धाम में पिछले दिनों सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर तेज आवाज वाले डीजे और म्यूजिक सिस्टम लगा कर नाच-गाना कराने और पर्यावरणविदों द्वारा इस पर आपत्ति जताये जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री श्री सतपाल महाराज द्वारा दिये गए उस हास्यास्पद बयान को जिसमें उन्होंने कहा था कि बद्रीनाथ धाम में शंख इसलिए नहीं बजाया जाता क्योंकि शंख हड्डी का बना होता है, प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष *श्री सूर्यकांत धस्माना* ने मूर्खता की पराकाष्ठा बताते हुए कड़ी निंदा की है।

पत्रकारों से बातचीत करते हुए *श्री धस्माना* ने कहा कि श्री सतपाल महाराज जैसे पढ़े-लिखे नेता पर भी कुसंगति का ऐसा प्रभाव पड़ा है कि वे अब ज्ञानी की तरह नहीं अज्ञानी की तरह बेतुके बयान देने लगे हैं। उन्होंने कहा कि एक तरफ भाजपा खुद को सनातन का ठेकेदार बताती है और दूसरी तरफ उसके सबसे वरिष्ठ मंत्री को यह भी नहीं पता कि शंख क्या है।

*श्री धस्माना* ने कहा कि शंख कोई हड्डी नहीं है। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में रहने वाले एक नर्म जीव घोंघे (Mollusc) का बाहरी खोल (Exoskeleton) है, जो उसके शरीर की मैंटल नामक परत द्वारा कैल्शियम कार्बोनेट से बनाया जाता है। इसमें न खून होता है न मज्जा, न यह शरीर के अंदर बनता है। हड्डी के विपरीत यह एक बेजान, पवित्र कवच है। यदि शंख हड्डी होता तो सनातन धर्म में हजारों वर्षों से इसे पूजा में, मंदिरों में, अभिषेक में इतना पवित्र क्यों माना जाता ?

उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम में शंख न बजाने का कारण हड्डी नहीं, बल्कि अध्यात्म है।

*पहला कारण –* बद्रीनाथ धाम ध्यान, योग, तपस्या का धाम है। यहाँ भगवान बद्रीनारायण स्वयं ध्यान में लीन हैं, इसलिए यहाँ शांत वातावरण रखा जाता है ताकि तपस्या भंग न हो। शास्त्रों में कहा गया है कि यहाँ देवता, यक्ष और ऋषि-मुनि आज भी तपस्या में हैं।

*दूसरा कारण –* पौराणिक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी शंख में निवास करती हैं और बद्रीनाथ में लक्ष्मी जी भगवान विष्णु की सेवा में हैं, इसलिए यहाँ शंख नहीं बजाया जाता। एक अन्य कथा में शंखचूड नामक राक्षस का वध होने के बाद उसकी अस्थियों से शंख की उत्पत्ति मानी गई, पर वह भी हड्डी नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक कथा है।

*श्री धस्माना* ने कहा कि यह दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड के संस्कृति, पर्यटन और धर्मस्व मंत्री को ही अपने धामों का विज्ञान और पुराण दोनों नहीं पता।

उन्होंने कहा कि असली मुद्दा यह है कि भाजपा सरकार ने बद्रीनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में, जो एक इको-सेंसिटिव जोन है, वहाँ तेज आवाज के डीजे लगा कर नाच-गाना करा कर न केवल धार्मिक मर्यादा भंग की है, बल्कि पर्यावरणविदों की चिंता भी सही साबित की है। अब अपनी गलती छुपाने के लिए सतपाल महाराज शंख को हड्डी बता कर जनता को बरगला रहे हैं।

*श्री धस्माना* ने मांग की कि सतपाल महाराज अपने अज्ञानतापूर्ण बयान के लिए प्रदेश की जनता और सनातन धर्मावलंबियों से माफी मांगें और मुख्यमंत्री तत्काल स्पष्ट करें कि क्या सरकार की यही आधिकारिक समझ है कि शंख हड्डी है।

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