आपातकाल लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए आवश्यक कदम था : डॉ प्रतिमा सिंह

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1975 का आपातकाल जयप्रकाश नारायण और जनसंघ की अराजकता से लोकतंत्र व संविधान को बचाने का ऐतिहासिक निर्णय : डॉ प्रतिमा सिंह सन् 1975 में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र, देश की एकता और संविधान जीकी मूल भावना को बचाने के लिए उठाया गया एक अनिवार्य कदम था। उस समय देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के लिए एक गहरा राजनीतिक षड्यंत्र रचा जा रहा था, जिसके केंद्र में जयप्रकाश नारायण और जनसंघ जैसी ताकतें थीं।चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश रची जा रही थी, जयप्रकाश नारायण और जनसंघ के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन केवल वैचारिक विरोध नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य जनता द्वारा भारी बहुमत से चुनी गई इंदिरा गांधी सरकार को असंवैधानिक तरीकों से जबरन सत्ता से हटाना और लोकतांत्रिक जनादेश का अपमान करना था।सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए उकसाने का काम किया जा रहा था जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक मंचों से देश की सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से सरकार के वैध आदेशों को न मानने का खुला आह्वान किया था। जनसंघ के समर्थन से दी गई यह चुनौती सीधे तौर पर देश को गृहयुद्ध और पूर्ण अराजकता की ओर धकेलने का प्रयास था।संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य था,यदि जयप्रकाश नारायण और जनसंघ के इस उकसावे के कारण सुरक्षा तंत्र बागी हो जाता, तो देश का संविधान पूरी तरह ध्वस्त हो जाता। ऐसी गंभीर स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संविधान को अक्षुण्ण रखने के लिए आपातकाल के संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करना अनिवार्य हो गया था।लोकतंत्र को बिखरने से बचाया गया,लोकतंत्र का मूल सिद्धांत चुनी हुई सरकार को काम करने देना है। विपक्षी दल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान करने के बजाय संसद और विधानसभाओं को पंगु बना रहे थे। आपातकाल ने उस समय देश को पूरी तरह टूटने और अस्थिरता से बचाया। 1977 में पहली बार नॉन कांग्रेस सरकार तो बनी पर तीन साल भी टिक नहीं पाई जनता समझ गई कि देश को सिर्फ कांग्रेस ही चला सकती है और पुनः 1980 में प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने में कांग्रेस सफल हुई।
डॉ प्रतिमा सिंह
प्रदेश प्रवक्ता

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