प्रो. नितिन खंडेलवाल के नेतृत्व में IIT रुड़की का बड़ा नवाचार, अम्लीय जल से यूरेनियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स निकालने वाली नैनो तकनीक विकसित

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अमीषा भट्ट

अम्लीय जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्व निकालने वाली विशेष नैनो तकनीक विकसितसिलिका-आवरणयुक्त अम्ल-प्रतिरोधी चुंबकीय नैनोकम्पोज़िट से प्रदूषित जल का शोधन और मूल्यवान संसाधनों की पुनर्प्राप्ति होगी संभवरुड़की, 01 अगस्त: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी उन्नत नैनो तकनीक विकसित की है, जो अत्यधिक अम्लीय और प्रदूषित जल से रेडियोधर्मी यूरेनियम तथा दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) को प्रभावी ढंग से हटाने और उनकी पुनर्प्राप्ति करने में सक्षम है।

यह उपलब्धि जल शोधन, पर्यावरण संरक्षण और रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।दुर्लभ मृदा तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्टफोन, पवन ऊर्जा संयंत्रों, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जबकि यूरेनियम परमाणु ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख ईंधन है। खनन गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट जल में ये तत्व अक्सर एक साथ पाए जाते हैं।

ऐसे में यूरेनियम की रेडियोधर्मी प्रकृति पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।इस चुनौती से निपटने के लिए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने सिलिका-आवरणयुक्त अम्ल-प्रतिरोधी चुंबकीय नैनोकम्पोज़िट विकसित किया है।

यह सामग्री प्रदूषित जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को अवशोषित कर उन्हें पुनः प्राप्त करने में सक्षम है। इससे एक ओर जल का शोधन होगा, वहीं दूसरी ओर मूल्यवान संसाधनों का पुनः उपयोग भी संभव हो सकेगा।शोधकर्ताओं के अनुसार खनन अपशिष्ट जल जैसे अत्यधिक अम्लीय वातावरण में सामान्य नैनोमैटेरियल तेजी से संक्षारित होकर अपनी कार्यक्षमता खो देते हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए सक्रिय नैनोकणों के चारों ओर सिलिका की सुरक्षात्मक परत विकसित की गई है। यह परत अम्लीय परिस्थितियों में भी सामग्री को सुरक्षित रखते हुए उसकी अवशोषण क्षमता बनाए रखती है।

विशेष बात यह है कि इसके निर्माण में पारंपरिक विषैले रसायनों के बजाय जैव-अनुकूल अभिकर्मकों का उपयोग किया गया है।प्रयोगशाला परीक्षणों में यह तकनीक प्रति किलोग्राम नैनोमैटेरियल से 370 ग्राम तक यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों की पुनर्प्राप्ति करने में सफल रही।

अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियों में यह विशेष रूप से यूरेनियम के प्रति चयनात्मक व्यवहार प्रदर्शित करती है तथा लगातार पांच चक्रों तक लगभग पूर्ण क्षमता के साथ कार्य करती है।

परियोजना के प्रमुख शोधकर्ता प्रो. नितिन खंडेलवाल ने कहा कि विकसित सामग्री अत्यधिक अम्लीय वातावरण में भी प्रभावी बनी रहती है, जबकि पीएचडी शोधार्थी भाव्या स्वामी ने बताया कि इसमें अपशिष्ट सीवेज स्लज से प्राप्त बायोचार का उपयोग कर इसे और अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाया गया है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक जल शोधन, रणनीतिक धातुओं की पुनर्प्राप्ति और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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