महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम, कांग्रेस-भाजपा में तीखी जुबानी जंग

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हरीश रावत के बयान से बढ़ी तल्खी, भाजपा ने कांग्रेस पर परिवारवाद और तुष्टिकरण का लगाया आरोप

                 


 महिला आरक्षण के मुद्दे पर उत्तराखंड की राजनीति जोरों पर है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर इस कदर बढ़ गया है कि मूल मुद्दा पीछे छूट गया है। दोनों दल एक-दूसरे की विचारधारा पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक रस्साकशी में उलझ गए हैं।

पूरे प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर तीखी जुबानी जंग देखने को मिल रही है, जिसमें हमले इतने तल्ख हो रहे हैं कि बयानों की राजनीति ने गंभीर चर्चाओं को पीछे धकेल दिया है।

हरीश रावत का हमला: ‘भाजपा का डीएनए है आरएसएस’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उसकी सोच स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी रही है। उन्होंने कहा, “भाजपा का डीएनए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ा है, जिसकी विचारधारा महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्ष में नहीं रही है।” रावत के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई और भाजपा मानो संभलकर टकराने लगी।

भाजपा का पलटवार: ‘राष्ट्रहित से न सरोकार, न सनातन से’

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता कुँवर जपेंद्र सिंह ने हरीश रावत के बयान पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा में आरएसएस का ‘जीन’ है, तो वह राष्ट्र और सनातन के प्रति समर्पित विचारधारा का प्रतीक है।

उन्होंने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा, “कांग्रेस पार्टी का ‘जीन’ एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (कांग्रेस के संस्थापक) से जुड़ा है। इस पार्टी में केवल परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति ही ‘आरक्षण’ के रूप में चलती है।”

‘हरीश रावत खुद पार्टी में आरक्षित हैं’

अपने बयान को और तीखा करते हुए जपेंद्र सिंह ने हरीश रावत पर तंज कसा। उन्होंने कहा, “बार-बार अपमानित होने के बावजूद हरीश रावत कांग्रेस में ‘आरक्षित’ बने हुए हैं। कांग्रेस को न तो राष्ट्रहित से सरोकार है और न ही सनातन मूल्यों से, जबकि भाजपा इन दोनों के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।”

बयानबाजी में उलझा महत्वपूर्ण मुद्दा

महिला आरक्षण जैसे अहम मुद्दे पर जहां गंभीर बहस और ठोस नीति की उम्मीद थी, वहीं राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी ने पूरे मसले को सियासी रंग दे दिया है। प्रदेश की जनता अब स्पष्ट रूप से देख रही है कि महिला सशक्तीकरण की बातें कहीं किनारे हो गई हैं और राजनीतिक रोटियां सेकने का काम शुरू हो गया है। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक गरमाने के आसार हैं।

                 

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